रायपुर,

राजस्थान में अशोक गहलोत को राजनीति का जादूगर कहना अपने आप में अतिश्योक्ति है। जिस नेता के नेतृत्व में कांग्रेस ने सभी चुनाव हारे हों, उसे जादूगर कहने का जोखिम सिर्फ उनके समर्थक ही उठा सकते हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में लड़ा गया, महज छह माह पहले बनी अशोक गहलोत की सरकार एक भी सीट नहीं बचा पाई। सरकार के मंत्री ही नहीं, बल्कि खुद अशोक गहलोत की सरदापुरा सीट पर भी कमल खिल गया।

साल 2018 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बजाए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में लड़ा। वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ तगड़ी हवा के बाद कांग्रेस को 99 सीटों पर जीत मिलीं।

मई 2014 में  जब अशोक गहलोत कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे, तब भाजपा ने राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज कर इतिहास बनाया। अगले पांच साल तक गहलोत ने विधानसभा में एक शब्द नहीं बोला।

2013 में कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के नाते अशोक गहलोत के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और हार का एक नया इतिहास बना दिया। भाजपा नरेंद्र मोदी की लहर में राज्य की 200 में से 163 सीटों पर जीतीं, वहीं कांग्रेस पार्टी महज 21 सीटों पर सिमट गई।

2008 का विधानसभा चुनाव  अशोक गहलोत और सीपी जोशी के नेतृत्व में लड़ा गया, जिसमें भी कांग्रेस को कोई खास सफलता नहीं मिली। इस बार भाजपा में वसुंधरा राजे और पार्टी अध्यक्ष ओम माथुर के बीच अंतर्कलह के बाद भी कांग्रेस पार्टी केवल 96 सीटों तक पहुंच पाई। बहुमत के लिए कांग्रेस को पांच सीट की जरुरत हुई तो बसपा के विधायकों को एक तरह से खरीदकर गहलोत ने पांच साल सरकार चलाई।

2003 का विधानसभा चुनाव गहलोत के नाम पर लड़ा गया, लेकिन पांच साल पहले परसराम मदेरणा की लीडरशिप में 153 सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट कर रह गई।

1998 के विधानसभा चुनाव में जहां परसराम मदेरणा का नेतृत्व था, तो कांग्रेस ने 153 सीट जीतीं, लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव के वक्त राज्य का नेतृत्व नए नवेले सीएम बने अशोक गहलोत कर रहे थे, और कांग्रेस को उसी चुनाव में 25 से 21 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।

यह परंपरा सी चली आ रही है कि राजस्थान में जिसकी सरकार होती है, लोकसभा चुनाव में उसी पार्टी के सांसद ज्यादा जीतते हैं। किंतु 1998 में कांग्रेस ने 200 में से 153 सीट जीतीं और महज कुछ महीनों बाद ही उसको 25 में से 21 लोकसभा सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।

1980 से 1999 तक लगातार सांसद रहे अशोक गहलोत को पहली बार 1999 में हुए विधानसभा उपचुनाव में विधानसभा का सफर तय करने का मौका मिला। इससे पहले दिसंबर 1998 में उनको नाटकीय तरीके से कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बना दिया था।

असल में अशोक गहलोत का जादू कभी किसी चुनाव में चला ही नहीं। इस बात के प्रमाण हैं बीते 20 साल के विधानसभा और लोकसभा चुनाव।

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